Sunday, June 30, 2013

केदारनाथ में तबाही के बाद


(एक)
 
लाशें इतनी कि
दफनाने को लकडि़यां कम पड़ गई हैं
दर्जी कफन सीते तंग आ गए हैं
डोम चिताओं को अग्नि देते-देते
और कब्र खोदनेवालों की कमर टूट गई है।
 
हर गांव, हर शहर में हर तरफ
ज़नाजे  ही ज़नाजे
जानी अनजानी-पहचानी-बेपहचानी लाशें ही लाशें
सड़कों पर, बगीचों में, दालानों में, बच्चे, स्त्री, पुरूष सब लाशें।
 
गायें रंभाती नहीं
घोड़े हिनहिनाते नहीं
भूखी बकरियां दौडती नहीं हरी पत्तियों की तरफ
स्कूल और खेल के मैदान श्मशानों में
मंदिर कब्रिस्तानों में देखते ही देखते
बदल गए हैं।
       
(दो)
 
क्या तुमने कभी सोचा है
कितना दु:ख होता है
जब एक औरत
भरी आंखों से
अपने बच्चे को गड़ढे में फेंक आती है
और अपने पति की कहीं
कोई धुंधली तस्वीर भी नहीं पाती है
 
हाहाकार और रूदन
जवान मांओं का करूण क्रंदन
सुनते सुनते मैं थक गया हॅूं
 
पेड़ों, पौधों, पशुओं और पंछियों के बारे में
मैं तुमसे कुछ नहीं कहता
पर मैं अपने दूध धुले बच्चे की किलकारी
फिर सुनना चाहता हॅूं .....................।
 
कुजड़े की बोली,
अमरूद बेचने वाले की आवाज,
दूधवाले की महक,
कामवाली बाई का गीत, कबाड़ी, दर्जी और
धोबी की सुबह-सुबह आवाज़
मैं फिर सुनना चाहता हॅूं
 
पड़ौस की लड़की का यों
छिपकर मिलना लड़के से
स्कूल से भारी बस्ता लेकर लौटती बच्ची
और डाकिये की साईकिल की
घंटी मैं फिर सुनना चाहता हॅूं ...............।
 

Friday, June 7, 2013

मेरी भी एक नानी थी


मेरी भी एक नानी थी            
सुनाती मुझे कहानी थी

मेरी भी एक नानी थी 
सुनानी मुझे उसकी कहानी थी

सूरत उसकी भली-भली सी थी 
कभी नीम तो कभी मिश्री की डली थी

मेरी माँ छांव में उसके पली थी।
मेरी भी एक नानी थी

उसकी भी एक नानी थी 
देती गुड़ धानी थी। 

नाना की जो नानी थी
बोली उसकी बड़ी सुहानी थी

सूरत भली-भली थी
पिलाती छाछ और खिलाती मक्खन की डली थी।

मेरी भी एक नानी थी
मुझे उसकी याद क्यूं आनी थी।

वो कभी न आनी थी
याद उसकी बार-बार आनी थी

मेरी भी एक नानी थी
उसकी कोई पाती तो आनी थी।

मेरी भी एक नानी थी
वो न कभी आनी थी
याद उसकी मगर रह-रहकर आनी थी।

शर्म

शर्म, लज्जा, आंख की शर्म
को शब्दकोष से निकाल दो
क्योंकि सबकी आंख का पानी मर गया है।

जो जितना बदनाम है
वो उतने नामवाला हो गया है।

कुख्यात अब कोई नहीं
सब ख्याति प्राप्त सुप्रसिद्ध, जाने माने, नामी लोग हैं
डाकू और गणमान्य में कोई फर्क नहीं रह गया है।

चैन खींचने वाले, उठाईगीर, हाथ की सफाई करने वाले
जेबतराश लोग होते हैं लहुलुहान
जिस भीड़ के हाथों
वो ही भीड़ करोड़ो रूपये खाने वालों को नोटो की माला पहनाती है।

सबकी शर्म कुएं में डूबकर मर गई है
पन्द्रह महीने जेल में गुजारने के बाद भी 
शर्म हमको मगर नहीं आती।

हम तब भी जनता के कंठहार बने रहते हैं
जेल में सजा काटी हमने तो क्या जेल को जीत लिया
जेल भी हमारे लिये फाईवस्टार से कम न थी
अपनी औकात को पहचानों
जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाओं
जैसी बातें दकियानूसी हैं
अब नया सोच नया घपला करने का है
अपनी हद को न जाने, अपनी चादर को अमेरिका तक फैलाओ
और सफल हो जाओ भले ही जेल जाना पड़े
जेल से छूटोगे तो हीरो बन जाओगे। 

ठहराव के बावजूद


(जनसत्ता से साभार)
जनसत्ता 30 दिसंबर, 2012: 


हमारे कवि जीवनानुभव और काव्यानुभव की चाहे जितनी बात करें, उनका जीवनानुभव कम हुआ और काव्यानुभव भी इधर छीजता दिखता है। सीमित विषय-वस्तु, सीमित मुहावरों और शब्दावली से हम कब तक काम चलाएंगे? कामचलाऊ मुहावरों और शब्दों से कविकर्म कब तक निपटाते रहेंगे? रोजमर्रा और अखबारी भाषा से भी बड़ी कविता संभव हुआ करती है, लेकिन उसके भीतर संघर्ष जरूरी होता है, जो हमारे कवियों में उतना नहीं दिखता है। कब तक खबर की भाषा या खबर ही हमारा मुख्य उपजीव्य होगी? 

वर्ष भर एक कविता में श्लील-अश्लील को लेकर हमारे कवि और आलोचक सिर-फुटव्वल करते रहे। इस तुमुल कोलाहल में अनेक महत्त्वपूर्ण कविताएं और संग्रह अचर्चित रह गए। यह सही है कि हमारे पास वरिष्ठ कवि हैं, जो पचहत्तर पार की उम्र में भी सक्रिय हैं, फिर भी कविता ठहरी हुई लगती है। हमारे पास विनोदकुमार शुक्ल ‘कभी के बाद अभी भी’ सक्रिय हैं, नरेश सक्सेना हैं जो ‘सुनो चारुशीला’ लाए हैं और प्रयाग शुक्ल ‘सुनयना फिर न कहना’ कह रहे हैं। रामदरश मिश्र की ‘आग की हंसी’ भी है। बीच में मलय भी हैं जो कुछ-कुछ दुरूह होने के बावजूद ‘इच्छा की दूब’ में काव्य सक्रियता दिखा रहे हैं। 

साथ ही इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त चंद्रकांत देवताले सक्रिय हैं। अरुण कमल की लोहे की धार कम नहीं हुई है। वे इस ‘महाशंख’ में भी शंख फूंकते हैं। उनकी राजनीतिक-सामाजिक चेतना कुंद नहीं हुई है। 

पूरनचंद्र जोशी जाने-माने समाजशास्त्री-अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ कवि भी हैं। उनकी कविता सुमित्रानंदन पंत सरीखी प्रकृतिपरक है, तो उसमें मजूरों की पीड़ा वाली प्रगतिशीलता भी है। ‘हिमाद्रि को देखा’ नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ की याद दिलाती तो ‘इत्यादि’ हाशिए पर छूट गए लोगों की पीड़ा का बखान है। 

रामदरश मिश्र संभवत: सबसे अधिक वय वाले कवि हैं, जो नब्बे की आयु में भी ‘आग की हंसी’ हंसने का ताब रखते हैं। वे नए मिजाज की कविताएं लिख रहे हैं- यह जानते हुए भी कि: ‘साथ नहीं जाएंगी कविताएं/ नहीं जाएगा इनसे अर्जित यश/ सब यहीं छूट जाएंगे/ जब मैं अनंत यात्रा पर जाऊंगा/ तो लोग कहते हैं- फिर मैं क्यों लिखे जा रहा हूं कविताएं/ जीवन के इस थके चरण में?’ प्रकृति और मनुष्य की न जाने कितनी छवियां उनके काव्य-संसार में टटके बिंबों के साथ हैं। 

हिंदी कविता में लगभग एक युग जीने वाले कवि ‘मलय’ भी उम्र के इस पड़ाव पर उतनी ही त्वरा, संजीदगी और संलग्नता के साथ अपने नौवें कविता संग्रह ‘इच्छा की दूब’ लेकर आए हैं। स्थिर और गतिशील बिंबों का समुच्चय उनके यहां इतना सघन है कि शब्द सांस लेते दीखते हैं। उम्र के इस दौर में हमारे कवियों के निजी अनुभव भी कविता में व्यक्त होने लगते हैं। मलय की पत्नी के अभाव में लिखी कविता है: ‘कुछ ही दिन हुए अभिन्न और अपनापे से भरी गहरी निर्मल नदी ने साथ बह चलने से हाथ खींच लिया/ मिनट भर में सूख गया/ सबका सब जीवन का राग।’ 

इसी तरह नरेश सक्सेना का ‘सुनो चारुशीला’ पत्नी विजय की स्मृति को समर्पित है: ‘क्या कोई बता सकता है/ कि तुम्हारे बिन मेरी एक वसंत ऋतु/ कितने फूलों से बन सकती है/ और अगर तुम होती क्या मैं बना नहीं सकता/ एक तारे से अपना आकाश।’ ‘गिरना’ जैसी अनेक अमर कविताओं के रचयिता कवि के पास ‘इस बारिश में’ जैसी कविता भी है, जिसमें जमीन के जाने की पीड़ा भी है। इस कविता में विस्थापन की पीड़ा बगैर किसी नारेबाजी के व्यक्त हुई है। 

विनोदकुमार शुक्ल हमारे समय के उन थोड़े-से कवियों में हैं जो कविकर्म के प्रति नितांत सजग और अपने हर संग्रह के साथ नई ऊंचाइयां छूते हैं। ‘कभी के बाद अभी भी’ में भी वे नामालूम-सी भाषा में बड़ी बात कहने और रचने के आदी हैं। ‘दुख कह देने की थोड़ी-सी ताकत है/ कोई नहीं आने वाला के इस/ इंतजार की ताकत नहीं/ अकेले रहने की ताकत बची है।’ 

बलदेव वंशी के ‘कविता समग्र’ (तीन खंड) में भी वे सब चिंताएं हैं, जो आज के कवि को मथ रही हैं। उनके यहां भूमंडलीकरण के बहाने खुले बाजारवाद की चिंताएं हैं। वैश्वीकरण का अजगर हमारी संस्कृति को लीलता जा रहा है। प्रकृति पर भी कुछ अच्छी कविताएं हैं। 

‘मैं वो शंख महाशंख’ में अरुण कमल की राजनीतिक-सामाजिक चेतना और प्रखर हुई है: ‘सरकार बिगड़े जमींदार की तरह सारे कल कारखाने चम्मच कटोरी/ बेच रही थी और अंत में उसने बच्चों के दूध की बोतलें भी बेच दी/ तब एक मां ने कहा- सरकार जी/ ऐसा करें कि संसद भी बेच दें/ और आप भी वैसे रहें जैसे हम यानी भारत के लोग/ अब सरकार ही क्या करेगी रह कर?’ इस संग्रह में कवि की जनपक्षधरता और मुखर हुई है। 
श्याम कश्यप का संग्रह ‘लहू में फंसे शब्द’ दो दशक बाद प्रकाशित हुआ है। श्याम सर्वप्रथम प्रकृति के कवि हैं, फिर जीवन जगत के, वादों के। ‘लहू में फंसे शब्द’ वे बाद में सुनाते हैं, प्रकृति के रागात्मक शब्द पहले आते हैं। इस दृष्टि के कश्मीर, दार्जिलिंग, कन्याकुमारी, गंगटोक पर लिखी कविताएं मनोरम हैं।

प्रकृति से लगातार गहरा तादात्म्य बनाए रखने वाले प्रयाग शुक्ल जैसे कवि विरले हैं जो गोचर-अगोचर प्रकृति के साथ लगातार संवादरत रहते हैं। ‘सुनयना फिर यह न कहना’ में वे ‘धूप का इतिहास’ लिखते हैं। उनके ‘हर क्षण साथ हैं/ रश्मियां सूर्य चंद्र की/ हर क्षण आकाश/   हवा, हर क्षण/ धरती भी पैरों के नीचे/ जल, बस वही वहीं है साथ/ हर क्षण!/ वही तल अतल में है/ दूर, नदी, समुद्र, बादल/ ताल में/ उसे लाना ढोना उगाहना/ उलीचना पड़ता है।’ बगैर काव्य रूढ़ियों के शिकार हुए वे अपनी काव्य पगडंडी पर चलते रहते हैं। ‘घना वृक्ष, फूल, ब्रह्मपुत्र’ कविताएं भी आकर्षक हैं। 

‘इतनी शक्लों में अदृश्य’ में नंदकिशोर आचार्य शेरो-शायरी और गजल की उर्दू परंपरा से प्रेरणा लेकर अपनी बात मितव्ययिता के साथ कहते हैं, जो तीर की तरह अचानक निशाने पर लगती है। ‘सूनेपन को अपने/ इतनी-इतनी शक्लों में/ अदृश्य करते हुए समय’ की नब्ज पकड़ते हैं। प्रकृति से भी गहरा तादात्म्य रखते हैं। वे कहते हैं- ‘मुबारक हो/ उन सबको अपना-अपना घर/ मुझ बेघर को/ यात्रा में सदा होना।’

माताचरण मिश्र ‘बच रहेगा जो’ में सही-गलत, न्याय-अन्याय के पक्ष में खड़े दिखते हैं: ‘सही और गलत की दुविधा में फंसा सन्नाटे में ही उठ आऊंगा मैं/ जिसका फैसला नहीं कर सकीं अदालतें/ ऐसे ही किसी एक फैसले का चश्मदीद गवाह बन कर ही/ लौट आना है मुझे/ इंसाफ के नाम पर सरासर बेइंसाफी सरेआम।’ सब कुछ देख कर आंखें मूंदने को विवश है आज कवि। 

‘सूर्य गिरा है अभी-अभी नीचे’ में राजेंद्र नागदेव प्रकृति राग के बीच भी विध्वंस राग और बाजारवाद और अन्याय और शोषण की मिसालें ढूंढ़ लेते हैं: ‘लोग किसी तरह रह लेते हैं/ बाघों, लकड़बग्घों, भेड़ियों के साथ जंगलों में/ और... शहरों में भी।’ इस वरिष्ठ अचर्चित कवि के पास भी युवा कवि-सी धारदार संवेदना है। हरीश आनंद के ‘नियति का यायावर’ में भी अच्छी प्रेम-प्रकृति की कविताएं हैं।

प्रतापराव कदम ने अपने चौथे काव्य संग्रह ‘उसकी आंखों में कुछ’ में धर्म और बाजार के बीच में पिसते आदमी की व्यथा को वाणी दी है। मुसलिम मानसिकता पर भी संग्रह में कारुणिक वृत्तांत है। कस्बे, अंचल की व्यथा भी झांकती है। पतंग में लगाया गया मांझा भी उन्हें षड्यंत्र नजर आता है। इसमें हमारे समय का भयावह राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य उजागर हो गया है। 

श्रीप्रकाश मिश्र ‘शब्द संभावनाएं हैं’ में प्रखर इतिहास और कालबोध लेकर आए हैं। ‘लेकिन सबसे बढ़ कर चिंतित है कवि/ कि शताब्दी के ढलते वर्षों में/ सदी के अंत के शब्द/ और सदी के अंत की कविता/ शोकगीत भी नहीं बन पा रही है/ जिसे लिखने वाले तो अनेक हैं/ पर पढ़ने वाला कोई अन्य-एक भी नहीं।’

‘हम बचे रहेंगे’ में विमलेश त्रिपाठी हमें रोकते-टोकते, मिलते बतियाते हैं: ‘जीवंत कर तुम्हें कवि हो जाऊंगा/ कि ईश्वर हो जाऊंगा।’ कवि कर्म को वे ईश्वर का दर्जा देते हैं। 

‘क्या तुम रोशनी बन कर आओगी आयरा?’ में विमल कुमार प्रेम की अनेक परिभाषाएं गढ़ते हैं। जितेंद्र श्रीवास्तव ‘कायांतरण’ में ‘जिसको देखो/ वही चाहता/ वही बने राष्ट्ररत्न/ उसके लगुवे उसके भगुवे/ देखो कैसे नामराशि का झंडा फहराएं’ जैसी पंक्तियां लिखने के बाद अचानक ‘परवीन बाबी’ नामक कविता लिख डालते हैं, जिसमें वे परवीन बाबी को शहीद का दर्जा देने की मांग करने लगते हैं। 

‘नंगे पांव...चांदनी’ में उपेंद्र कुमार भोजपुरी की बोली-बानी-मुहावरे में अपनी बात कहते हैं। वे ‘सत्तू’ जैसे विषय पर भी कविता लिखते हैं। 

‘कहना नहीं आता’ में पवन करण नई विषय-वस्तु के साथ नई सज-धज के साथ तो हैं, पर किंचित शब्दस्फीति के शिकार हो गए हैं। फिर भी ‘ईश्वर’ आदि उनकी कविताएं ध्यान खींचती हैं: ‘पत्थर में रहते-रहते मैं भी पत्थर हो गया हूं/ पत्थर की आंख, पत्थर के कान/ पत्थर की जीभ और पत्थर के हाथ/ पत्थर का ईश्वर या तुम मुझे ईश्वर एक पत्थर/ या बस पत्थर कह सकते हो/ पत्थर कहा भी जाता रहा हूं।’

इस वर्ष कविता की नई फसल अच्छी आई है। प्रियदर्शन का ‘नष्ट कुछ भी नहीं होता’ अपनी नई विषय-वस्तु, नई भाषा-शैली के कारण ध्यान खींचता है। कथाकार होने का फायदा उनके कवि को मिला है। वे ब्योरों में जाकर कविता का एक मार्मिक वितान रचते हैं। 

कवि कर्म की विफलता, कविता से पैदा हुआ शून्य अच्छे अच्छे कवियों के पांव डिगा रहा है। नरेंद्र जैन भी ‘चौराहे पर लोहार’ में अपने समकालीन परिदृश्य से दुखी हैं। वे कहते हैं कि अच्छी कविता लिखी नहीं जा रही: ‘अभिनय करती कोई कविता/ ज्यादातर तो वह कविता का कोई/ बहरूपिया हुआ करती है/ वह बोलती तो है लेकिन परदे के पीछे से/ कोई दोहरा होता है उसके संवाद।’ 

इस चौतरफा सैलाब में नए कवि अच्छी कविता लेकर आए हैं जिनमें कुमार अनुपम का ‘बारिश मेरा घर है’ अग्रिम पंक्ति में रखा जा सकता है। अपनी पहली किताब में वे संभावनाएं जगाते हैं। वे जानते हैं कि ‘यह नागरिकता के सामान्यीकरण का दौर है/ यह स्वतंत्रता के सामान्यीकरण का दौर है/ यह अभिव्यक्ति के सामान्यीकरण का दौर है।’ फिर भी उनकी अभिव्यक्ति सामान्यीकरण की शिकार नहीं है। 

इसी तरह प्रदीप जिलवाने के कविता संग्रह ‘जहां भी हो जरा सी संभावनाएं’ में अनंत संभावनाएं हैं। उनकी ‘पिता की साइकिल’, ‘ऊन के जीर्ण-शीर्ण मंदिर’ और ‘नमक’ कविताएं उच्च कोटि की हैं। इसी वर्ष प्रकाशित ‘पृथ्वी पानी का देश है’ के कवि प्रेमशंकर शुक्ल के यहां: ‘चुटकी भर नमक और माड़-भात/ हमारे जनपद की कितनी औरतों की/ जिंदा रखे हुए है भूख-पिआस।’ किसान संस्कृति से जुड़े इस कवि के पास पानी की असंख्य स्मृतियां हैं। अनंत आख्यान हैं। पानी के अनंत प्रत्यय हैं। 

पहले ही कविता संग्रह   ‘अस्सीघाट का बांसुरीवाला’ में तजेंदरसिंह लूथरा भी नई ताजगी लेकर आए हैं। ‘योजनाओं का शहर’ में संजय कुंदन ने बदले मिजाज की कविताएं लिखी हैं: ‘जो जितना कम आदमी रहता है/ वह उतना ज्यादा आदमी समझा जाता है/ उसकी तारीफ में कहा जाता है/ क्या आदमी है।’ विनोद शर्मा कहते हैं: ‘शब्दों से परे होती है कविता।’

सिर्फ रेत और जल के बिंबों और रूपकों को केंद्र में रख कर संग्रह भी इस वर्ष आए। इनमें श्रीप्रकाश शुक्ल का संग्रह ‘रेत में आकृतियां’ और प्रेमशंकर शुक्ल का ‘पृथ्वी पानी का देश है’ प्रमुख हैं। जहां श्रीप्रकाश रेत और नदी के बीच, दिक और काल के अनेक टटके बिंब खोजते हैं वहीं प्रेमशंकर ‘पानी’ को लेकर अनेक लोकोक्तियों और मुहावरों का सहारा लेते हैं। नदी एक कलाकार के लिए ‘कैनवास’ का काम करती है तो एक कवि के लिए भी वह अभिव्यक्ति के नए क्षितिज का उद्घाटन करती है। दोनों कवि देशज शब्दों के माध्यम से नदी और रेत-पानी और डाल का इतिहास और भूगोल बताते हैं। कौन कहता है कि हिंदी कविता से प्रकृति गायब हो गई है! 

युवा कवि निशात भी अपने संग्रह ‘जी हां...लिख रहा हूं’ में अनेक चित्रकारों-कलाकारों से प्रेरणा लेते हैं, यहां तक कि फिल्मकारों से भी! कलाओं का यह अंतर्संबंध उनके संग्रह में मुखर हुआ है।

‘लाल्टू’ के ‘सुंदर लोग और अन्य कविताएं’ में पेड़ भी लाज से कांप जाता है: ‘दरख्त को क्यों इतनी झेंप/ जब भी देखूं/ लाज से कांप जाता/ पूछा भी कितनी बार/ छुआ भी संभल-संभल/ फिर भी आंखें फिसलतीं/ पत्ते सरसरा कर इधर उधर/ झेंप झेंप बुरा हाल।’

हमारे समय में कई ‘प्रवासी’ कवि सक्रिय हैं, जो ‘एक महाद्वीप से दूसरे तक ले जाते अपनी भाषा/ दुनिया और किसी अज्ञात के बीच एक घर साथ/ ले जाते आम और पीपल का गीत/ ले जाते कोई ग्रीष्म कोई दोपहर।’ (रेत का पुल: मोहन राणा) और रेखा मैत्र ‘यादों का इंद्रधनुष’ ताने हैं।

इस वर्ष कवयित्रियों में माया गोविंद (माया राग), वर्तिका नंदा (थी हूं रहूंगी), पद्मजा शर्मा (सदी के पार), ममता किरण (वृक्ष था हरा भरा), रेखा चमोली (पेड़ बनी स्त्री), प्रज्ञा रावत (जो नदी होती), सुनीता कांबोज (अनुभूति) और सुनीता जैन के एक साथ चार, वंदना मिश्र (वे फिर आए हैं), रंजना श्रीवास्तव (इन दिनों रोशनी भीतर बजती है), लीना मल्होत्रा राव (मेरी यात्रा का जरूरी सामान) के संग्रह प्रकाशित हुए। माया गोविंद मंच और सिनेमा की चर्चित कवयित्री हैं, वर्तिका नंदा ने मीडिया से भाषा अर्जित की है, पद्मजा शर्मा, ममता किरण और रेखा चमोली के पास स्त्री संवेदना है। प्रज्ञा रावत कैटवॉक पर व्यंग्य करती हैं: ‘ऐसे समय में जब/ कैटवॉक कर रहे हों/ कवि और रैंप पर/ इठली रही हों कविताएं/ तो कौन सुने आत्मा का गीत।’ 

अदम गोंडवी, बल्लीसिंह चीमा की जनचेतना वाली गजलें भी पाठकों में लोकप्रिय हुर्इं। चीमा की ‘हादसा क्या चीज है’ हाथोंहाथ बिकी। आशीष दशोत्तर ने ‘लकीरें’ में छंद का अच्छा निर्वाह किया। डॉ. अमरेंद्र ने ‘दीपक मेघ हिंडोल’ में ‘मधुमास’ में ऋतुओं पर अच्छे सॉनेट लिखे। विजय राठौर का नवगीत संग्रह ‘दिन उजालों के’ भी आया।

इन कवियों के संग्रह भी उल्लेखनीय रहे: गौरव सोलंकी (सौ साल फिदा), गोपाल कमल (सूत की कहानी), जीवन शुक्ल (तुम न होगे तो), मनोज कुमार शर्मा (ये गलत बात है), सुशील राकेश (अनहनादी बच्चे), रिपुसदन श्रीवास्तव (जिंदगी के लिए ही), संजय आचार्य वरुण (सुन! ओ ठहरे हुए एक दिन), सुधांशु उपाध्याय (आने वाले कल पर), हीरालाल बाछोतिया (विद्रोहिणी शबरी), वेदप्रकाश वटुक (और ईसा मर गया), अंशुल त्रिपाठी (आधी रात में देवसेना), उमेश चौहान (जनतंत्र का अभिमन्यु)।

‘कवि ने कहा’ शृंखला के अंतर्गत अरुण कमल, विनोदकुमार शुक्ल, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, वीरेन डंगवाल, इब्बार रब्बी, कात्यायनी, भगवत रावत, राजेश जोशी और कुमार अंबुज की चुनी हुई कविताएं भी इस वर्ष प्रकाशित हुर्इं। 

‘कला और कविता’ पर एक काव्य संचयन प्रयाग शुक्ल ने किया। तसलीमा नसरीन की कविताओं के अनुवाद ‘मुझे देना और प्रेम’ (अनु. प्रयाग शुक्ल) और अक्क महादेवी की कविताओं का ‘भैरवी’ नाम से अनुवाद (यतींद्र मिश्र) उल्लेखनीय रहे। इनके अलावा ‘निकोलास गीच्येन की कविताएं’ (सुरेश सलिल), ‘अफ्रीकी कविताएं’ (राजा खुगशाल), ‘हिम की पर्णकुटी’, ‘चांद के पार’ (राज बुद्धिराजा), ‘देवकी होना यशोदा भी’ (मनोरमा विशाल महापात्र), ‘तर्कहीन युद्ध’ (स्वर्णजीत सवी), ‘किताब जिंदगी की’ (कृष्ण कन्हैया) ने भी काव्य संसार को समृद्ध किया। 

तुम्हारे लॉकर में बहुत सारे गहने हैं

तुम्हारे लॉकर में बहुत सारे गहने हैं
और किसी के पास नहीं
केवल तुम्हारे पास
तुमको उनका मोल भी मालूम नहीं

एक दो नहीं
कई हैं
छोटे-बडे़
तरह-तरह के रंग-रूप के कई गहने
मैंने देखे हैं।

कुछ झिलमिलाते हैं
कुछ देर तक चमकते हैं
कुछ चमकते नहीं
पर वे हैं
मैंने देखे हैं।

वे कभी नहीं घिसेंगे
उनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी
वे कभी नहीं टूटेंगे
उनका मोल कभी कम न होगा।
वे रहेंगे पीढि़यों तक वैसे ही सही सलामत

कोई चोर डाकू उन्हें चुरा न पाएगा
कोई किसी हाट बाजार में बेच न पाएगा
कोई उनकी ठीक-ठीक कीमत नहीं लगा पाएगा।
वे रहेंगें तुम्हारे पास

वे सोने-चांदी-तांबे-कांसे-पीतल के नहीं
नकली केवल दिखावे भर के भी नहीं
बिल्कुल असली २४ कैरट खरे सोने के।

कभी-कभी मैं उनकी चमक देखता हूँ
कभी-कभी मैं भी नहीं देख पाता
कभी-कभी मैं उनका मोल लगाता हूँ
कभी-कभी मैं भी नहीं लगा पाता।

संसार में जितनी भी धातुएं हैं
वे उन सबसे अलग
सबसे जुदा उनकी धज
उनको जांचने-परखने की कसौटी
किसी के पास नहीं।

वे कई बार आँखों से दिखते
और कई बार आँखोंसे नहीं दिखते हैं।
किसी ने भी नहीं देखे वे गहने
मैंने देखे हैं

अपनी इन दो आँखों से।
वे कहीं गहरे छिपे हैं तुम्हारी आँखों में
केवल तुम्हारी देह पर नहीं खिलते वो

तुम्हारे भीतर की अतल गहराईयों में
रत्न की तरह छिपे
पृथ्वी की अनंत गहराईयों में
हाथ आते वे
हीरे की तरह अचानक और कभी-कभी तो जान ले लेते हैं
तब भी हाथ नहीं आते।

राजा-महाराजाओं के भी हाथ नहीं आते वे
और कभी-कभी टकराते हैं
एक मजदूर की कुदाल से
उसके पसीने की बूंदो से चमकते हैं वे।




Saturday, May 18, 2013

छाया भी साथ छोड़ देती है


कोई स्वाद देर तक नहीं रहता
जबान पर
खट्टे के बाद मीठा
मीठे के बाद खट्टा
करेले के बाद रस
मिर्ची के बाद मिश्री

कोई कविता कोई गीत देर तक नहीं रहता
कोई दृश्य कोई आवाज नहीं टिकती देर तक

कोई रहस्य देर तक नहीं रहता
कोई राज राज नहीं रहता

भूत भी नहीं डराते अब
हर सपना सुबह होने पर टूट ही जाता है
कोई रिश्ता देर तक नहीं रहता
यहां तक कि बेटी अपनी भी पराई हो जाती है
बेटा नौ महीने तक पेट में रहने पर भी भूल जाता है
कि यह औरत उसकी माॅं है
और वह इस के पेट से नहीं किसी चोर दरवाजे से आया है

शाम ढलने पर छाया भी साथ छोड़ जाती है
पतझड़ आने पर पत्ते भी छोड़ देते हैं साथ
पेड़ बेचारा अकेला नंगा खड़ा रहता है

लहलहाते तालाबों का साथ छोड़ देता है पानी
लबलबाते कुएं भी एक दिन सूख जाते हैं
कि उनको कुआं कहने मंे भी शर्म आती है

साल के कुछ दिन कुछ महीने तो
नदी भी बस नामकी नदी रह जाती है
कोई भी कुछ भी देर तक नहीं रहता

कलम इस कदर सूख जाती है अक्सर
कि "अ" अनार का भी नहीं लिखा जाता।

एक शब्द भी कभी कभी ऐसा जानलेवा हो जाता है
कि मरने के बाद ही बाहर निकलता है।

अपने हाथों पर पाले तोते ही एक दिन उड़ जाते हैं
ग्यारह दिन का कुंभ भी आखिरकार एक दिन खत्म होता है
महाकाव्य का भी आखिरकार कोई अंतिम सर्ग होता ही है
महापुरूष का भी कोई आखिरी शब्द होता ही है।
महानायक को भी एक दिन कहना पड़ता है पैक-अप
शो मस्ट गो ओन कहने वाले का भी
आखिर शो कब तक चल सकता है।
मीलों तक चलने के बाद एक दिन
जीरो किलोमीटर आता ही है।

पार करने के बाद पुल भूल जाते हैं राहगीर
नाव भूल जाते हैं केवट।

एक दिन जब में सिक्के खनकना  भूल जाते हैं
एक दिन अपनी ही सांस की आवाज सुनाई देनी बंद हो जाती है।

एक दिन भूल जाते हैं हम सब बचपन का पहाड़ा
पंडित ऐन हवन के वक्त भूल जाते हैं श्लोक
और जिन्दगी के मायने कई बार इतने जटिल निकलते हैं
कि किसी शब्दकोष में  उनका कोई अर्थ नहीं निकलता।

हर चालीस सेकंड में कहीं न कहीं खत्म हो जाता है
एक भरपूर जीवन
लहलहाती हुई फसलें रातोंरात बर्बाद हो जाती हैं
मजबूत से मजबूत भवन जमींदोज हो जाते हैं।
 

Sunday, May 12, 2013

लौटना मां के पास

नवहिंदुस्तान से साभार:
 
लौटना मां के पास
राजेन्द्र उपाध्याय 
 
मां के पास लौटता हूं बार-बार
बगैर किसी आमंत्रण के
कभी भी किसी भी वक्त - बेवक्त
कभी कुछ खाये, कभी कुछ भी न खाये
कभी-कभी तो ऐसे भी लौटता हूं जैसे
बरसों से कुछ भी न खाया हो।
 
खाकर भी गया हूं
तो भी खाकर आया हूं
पहनकर गया हूं
तो भी पहनकर आया हूं
मां के पास गरीबी में भी
मेरे लिए रहा है कुछ न कुछ
मूड़ी हो या भुनी हुई हरी मिर्च
वही रही मेरे लिए अमृत
जाता हूं कई बार पहनकर सूट-बूट
और पाता हूं जैसे मां के सामने कुछ भी नहीं पहन रखा है
वैसे ही हूं जैसे उसने मुझे पैदा किया होगा। 
 
अक्सर सपने में नहलाती है वह
जब धूल में लथपथ धूप में लाल होकर गया हूं
मलहम लगा रही है मेरी खरौंचों पर जहां-तहां
यह देह जितनी मेरी उतनी ही मां की है
मां के पास गया हूं अगहन में, माघ में, भादों में, जाड़े में, बरसात में
जनवरी में, जुलाई में
कभी एकदम भोर में, तो कभी सरेशाम
गर्मियों में तपती छत पर ठंडे तकिये की तरह मां का हाथ है सिर पर
सर्दियों में वह गरम रजाई
और मैं वहीं बचपन का लड़का जिसका कोई नाम नहीं।