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Sunday, September 16, 2012

कौन ललितपुर

जनसत्ता 26 मई, 2012: ललितपुर के प्लेटफार्म नंबर तीन पर सुबह ही आ गया था। झांसी के पास इस जनपद के स्टेशन पर सब बड़ी गाड़ियां नहीं रुकती हैं। हीराकुंड एक्सप्रेस विशाखापत्तनम से आकर अमृतसर जाने वाली थी। मैं उसी का टिकट लेकर बैठा था। सभी गाड़ियां विलंब से चल रही थीं। गोंडवाना एक्सप्रेस को रात साढ़े ग्यारह बजे आना था। उसकी सवारियां रात भर इंतजार करती रहीं। हीराकुंड एक्सप्रेस पहले सही समय पर थी। बाद में घंटा भर देर हुई और अब धूप निकल आने के बाद भी मैं वहां बैठा इंतजार कर था। वहां नहीं रुकने वाली गाड़ियां धड़धड़ाती हुई गुजर रही थीं। मुंह अंधेरे ही बुंदेलखंड पैलेस होटल से चला आया था। वहां एक बरात के साथ ठहरा था। बरात बस में बैठ कर चली गई और मैं बुंदेलखंड पैलेस में अकेला रह गया था। नींद नहीं आ रही थी। बरात के जाने के बाद का सूनापन ‘भांय-भांय’ कर रहा था। खाली पड़े गिलास, प्लेटें, साबुन, कंघे, पान-मसाले के पाउच आदि रह गए थे।

होटल से निकल कर चाय पीने गया। स्टेशन सामने ही था, छोटा-सा। विकलांगों के लिए विशेष सुविधा वाला। शौचालय भी विकलांगों का खयाल रखने वाला था। पर उनके रेल में चढ़ने की कोई सुविधा नहीं थी। डिब्बे के तल के मुकाबले प्लेटफार्म नीचे था। तीन-चार सीढ़ियां चढ़ कर डिब्बे में चढ़ते-उतरते हुए पैर फिसलने का डर होता है। सामान लेकर चढ़ने में हालत खराब हो जाती है। अमेरिका में ‘एमट्रैक’ रेल से ईस्टकोस्ट से वेस्टकोट, सनफ्रांसिस्को से न्यूयार्क तक की यात्रा की थी। वहां रेल के भीतर तो गरम पानी सहित सब सुविधाएं थी हीं, प्लेटफार्म पर डिब्बे में चढ़ने के लिए छोटी चौकी भी रखी थी। साफ-सफाई थी। लेकिन अपने यहां की बात निराली है। जो है सो रेल की पटरियां हैं। शौचालय आदि की सुविधाओं के लिए फिर से सीढ़ियां चढ़ कर पुल पार कर एक नंबर प्लेटफार्म पर जाना पड़ता है।

अचानक कुछ औरतें एक पैसेंजर गाड़ी से लकड़ियां लेकर उतरीं। पैरों में ‘स्लीपर’ थे जो घिस कर पैरों की तरह ही हो गए थे। तन पर बरसों पुरानी साड़ियां, गंदी मैली-कुचैली। चार महिलाएं थीं और उनके आठ गट्ठर थे सूखी लकड़ियों के। एक-एक कर ले जा रही थीं सीढ़ियां चढ़ कर पुल से, पटरी पार करके नहीं। इसी बीच एक ‘उच्च पार्सल यान’ गुजरी। पूरी बंद थी। यात्री गाड़ी जैसे ही बंद डिब्बे थे, पर खिड़कियां नहीं। दरवाजे सीलबंद। एक मालगाड़ी भी गुजरी। पीछे गार्ड झंडी दिखाता हुआ। गार्ड की भी क्या जिंदगी है... चलते रहो! ‘एकला चलो रे...!’ रवि बाबू का यह गीत गार्ड ही सच्चे अर्थों में रूपायित करता है! कितनी बोरियत होती होगी उसकी जिंदगी में! कोई पुकारता नहीं, किसी से बात नहीं कर सकते। टीवी-रेडियो कुछ नहीं। खाली डिब्बे में बैठे-बैठे बोरियत हो जाती है, पर पूरी ट्रेन के पीछे वह अकेला गार्ड, लोहे के डिब्बे में बैठा।

बहरहाल, वे औरतें लकड़ियां ले जा रही थीं। एक दूसरे की मदद करती। एक औरत आखिरकार हार कर पटरी से पार करने लगी। मैं डर रहा था, वह नहीं। घिस चुकी चप्पल पहने कर पटरी पार करने पर पत्थर चुभते होंगे। अगर वह चप्पल भी टूट या फंस गई पटरी के बीच या वह खुद गिर गई और ट्रेन आ गई तो क्या होगा! ‘सदियों’ पुराने उन पैरों में सदियों पुरानी चप्पलें थीं! फिर भी वे घिस रही थीं, टूट नहीं रही थीं। वे इन लकड़ियों से कितना क्या कमा लेंगी? एक तरफ इस देश की औरतें कितनी हाड़तोड़ मेहनत करती हैं, वह भी जान जोखिम में डाल कर। दूसरी ओर, धन के भूखे हमारे कई नेता हैं जो राज करते हैं राजधानियों में। महानगर की महिलाओं को सब्जी काटने या आटा गूंधने के लिए भी ‘हेल्पर’, यानी नौकरानी चाहिए। राजधानी में चमचमाती कारें हैं, महंगे मोबाइल हैं। कीमती जूते पहने गहनों से लदी महिलाएं हैं, महंगे पर्स लिए। और वे...! वे कब तक लकड़ियां इसी तरह बीन कर घिसी हुई चप्पल पहने पटरियां पार करती रहेंगी, दो जून की रोटी और नमक के लिए?

यह कौन-सा ललितपुर है? बुंदेलखंड के किस भूभाग में? क्या यह इसी भारतवर्ष का हिस्सा है? देश को आजाद हुए कितने बरस हुए, क्या इन्हें पता है? ‘मनरेगा’, आरटीआई, टूजी घोटाला क्या है? कितने हजार करोड़ का घोटाला कर डाला हमारे कर्णधारों ने! और ये औरतें... इसी तरह पटरी पार करते समय किसी दिन ऊपर चली जाएंगी! कौन इन्हें याद रखेगा! मेरी गाड़ी आ गई। मैं अपनी आरक्षित बर्थ तक पहुंचा। एक सरदार जी अपना केश खोले पसरे हुए थे। अमृतसर जा रहे थे। उन्हें थोड़ी-सी जगह देने को कह कर बैठ जाता हूं। खिड़की से बाहर ललितपुर, बुंदेलखंड जा रहा है। हरी-भरी धरती तेजी से पीछे छूट रही है, पुल के नीचे नदी बह रही है। सुंदर दृश्य है। लकड़ियों वाली उन औरतों को मैं भूल रहा हूं। मेरी रेल लकदक राजधानी की ओर जा रही है। मुझे ललितपुर से क्या?

विकल है कोलकाता

(जनसत्ता 24 जुलाई, 2012)

कुछ समय पहले कोलकाता जाना हुआ। 1983 में दिल्ली जाने से पहले इसी ‘कलकत्ता’ की बसों, ट्राम या मिनी बस में खूब धक्के खाए थे। पैदल झोला लटका कर घूमा। तब ‘मूड़ी’ वाले बहुत घूमते थे। अब नहीं दिखते। कहां चले गए वे ‘मूड़ी’ वाले, फुचके (गोलगप्पे) वाले! जगह-जगह शॉपिंग मॉल खुल गए हैं। दुकानों पर चिप्स वगैरह मिल रहे हैं। निर्जन इलाके आबाद हो गए हैं। चौराहों पर भीड़भाड़ है। गाड़ियां ज्यादा हैं। पीली-पीली टैक्सियां दौड़ रही हैं। साइकिल पर कम लोग जाते हैं। कई फ्लाईओवर बन गए हैं, फिर भी जाम से निजात नहीं!

हंगरफोर्ड स्ट्रीट (पता नहीं कौन थे ये अंग्रेज) पर सरकारी सर्किट हाउस के कमरा संख्या 2/3 में ठहरा। दूसरी मंजिल पर उस कमरे के बाहर तेईस नंबर लिखा है। लेकिन यह समझ नहीं आया कि उसे 2/3 क्यों बोलते हैं। डेढ़ सौ रुपए में डबल बेड का बड़ा-सा कमरा था। खिड़की के बाहर मिंटो पार्क दिख रहा था। वहां फव्वारा चल रहा था और थोड़े अंधेरे में एक प्रेमी जोड़ा बैठा था। कोलकाता में प्रेम ऐसे ही होता है, बगीचों में। ज्ञानेंद्रपति की एक कविता ‘ट्राम में एक याद’ याद आ रही है- ‘चेतना पारीक, कैसी हो? ...क्या अब भी जिससे करती हो प्यार, उसे दाढ़ी रखाती हो? ...उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफिक जाम है/ भीड़भाड़ धक्का-मुक्का ढेल-पेल ताम-झाम है/ ट्यूब रेल बन चल रही ट्राम है/ विकल है कोलकाता दौड़ता अनवरत अविराम है...।’

बगल में बेल व्यू नर्सिंग होम है, जहां सत्यजीत रे का देहांत हुआ था। अब उनके नाम पर वहां सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट है। इसी इलाके में भारतीय भाषा परिषद है। वहां प्रभाकर माचवे के साथ चार सौ रुपए महीने की तनख्वाह पर काम करता था। तब इतने कम पैसे होते थे कि मौज नहीं कर पाता था। अब पास में पैसे हैं तो वह उत्साह नहीं। फिर भी सोचा कि जितने दिन वहां रहना है, ठाठ से रहूंगा। बांग्ला फिल्म देखूंगा। कम से कम समझ तो लेता ही हूं! अब वहां पारंपरिक बंगाली धोती-छतरी वाले लोग नहीं दिखते। सब पैंट और बुशर्ट पहनते हैं। लड़कियां भी जीन्स पहने रहती हैं। शायद कोलकाता की अपनी पहचान खो रही है। कुछ समय पहले श्रीनगर में भी यही नजारा देखने को मिला था। जबलपुर, कानपुर, रायपुर... हमारे देश के सब शहर एक जैसे हो रहे हैं। खानपान भी सब वही। इडली डोसा, कचौड़ी, समोसा, पास्ता, चाउमीन... वगैरह।

 नीचे नाश्ता करने उतरा। स्वागत कक्ष के काउंटर पर बांग्ला के तीन-चार अखबार थे। अंग्रेजी के ‘द टेलीग्राफ’ के ऊपरी हिस्से पर ‘कलकटा’ लिखा था। वहां बैठे बंगाली बाबू से मैंने पूछा- ‘ऐसा क्यों?’ उसने कहा- ‘बदला नहीं होगा; रह गया होगा!’ हिंदी कहानीकार अशोक सेकसरिया से मिलने गया। उनके यहां भी ‘द टेलीग्राफ’ था। उनका ध्यान दिलाया तो वे बोले- ‘इस पर ध्यान ही नहीं दिया कि ‘टेलीग्राफ’ ने क्यों नहीं बदला।’ वहां का उच्च न्यायालय अब अब भी ‘कलकत्ता’ हाईकोर्ट ही है। जैसे ‘बंबई’ हाईकोर्ट और ‘बंबई’ शेयर बाजार अभी ‘मुंबई’ और ‘मद्रास’ हाईकोर्ट अब तक ‘चेन्नई’ नहीं हुआ है।

अशोक सेकसरिया सोलह, लार्ड सिन्हा रोड पर रहते हैं। आसपास विशाल अट्टालिकाएं, वातानुकूलित बाजार और बीएसएफ का दफ्तर है। चारों ओर से घिरे उस मकान में केवल शब्दों के सहारे उन्होंने अपनी अब तक की उम्र गुजार दी। एक चारपाई पर लेटे थे। दुग्धधवल दाढ़ी, अगल-बगल चार-पांच अखबार, कुछ पुरानी किताबें। उस दिन विवेकानंद जयंती थी। बीच में कृष्ण बिहारी मिश्र का फोन आया-  ‘मेरा विवेकानंद पर लेख देखा! नहीं देखा! देखिए।’

उनसे फिर आने का वादा करके निकलता हूं। अब बिड़ला के नाम पर बने तारामंडल से मिनी बस पकड़ कर लेक रोड जाना था। वहीं कई लोगों को सड़क किनारे फुटपाथ पर ही नहाते देखा। शायद बहुत सारे लोगों के पास स्नानघर जैसी सुविधा नहीं थी। मिंटो पार्क का नाम बदल कर भगत सिंह उद्यान और भारतीय भाषा परिषद के पास महाराणा प्रताप उद्यान करने से क्या कोलकाता की तस्वीर बदल जाएगी? वहां का बांग्ला मानुष कहां बिला गया? धोती-कुर्ता पहने, बारिश हो या नहीं हो, हाथ में छड़ी या छतरी लिए जो पैदल ही सड़क पार करता था! आज सिर्फ गाड़ियां ही गाड़ियां!

खैर, कोलकाता की एक ट्राम में बैठ गया। साढ़े चार रुपए का टिकट लिया। कंडक्टर ने अठन्नी वापस की। कोलकाता में अभी भी अठन्नी बची है। रवींद्र सरणी पर रवींद्र भारती विश्वविद्यालय है। यहां कला वीथिका देखने के लिए दस रुपए का टिकट लगता है। 1961 में रवींद्र शताब्दी के अवसर पर जवाहरलाल नेहरू यहां आए थे और इस विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी। रवींद्रनाथ के लिखने-पढ़ने, खाने-बैठने आदि के कमरे देखे। वहां कहीं कोई पोखर नहीं था। होता तो कितना अच्छा होता! उसमें कमल खिले होते।
रवींद्र सरणी में साड़ियों की बहुत सारी दुकानें हैं। ट्राम, हाथ रिक्शा, टैक्सी, स्कूटर सब एक साथ चलते हैं। एक ‘महारास’ निरंतर जारी रहता है कोलकाता में!

Wednesday, April 14, 2010

मुंबई सा इंदौर


(Source: जनसत्ता: 23 मार्च 2010)

Tuesday, April 13, 2010

घुमक्कड़ी के बहाने



(Source: जनसत्ता: 11 अप्रैल 2010)

नटराज उदयशंकर के घुंघरुओं की आवाज

उदयपुर में जन्मे महान् कलाकार उदयशंकर वास्तव में नटराज थे। उदयशंकर के बारे में कहा जाता है कि देवताओं ने उन्हें अपना रूप दिखाने के लिए इस धरती पर भेजा था। इसीलिए जिन-जिन लोगों ने उनकी नृत्य मुद्राएँ देखी है- उन्हें उनमें दिव्यता का दर्शन तो होता था। यह भी लगता था कि जैसे साक्षात् इन्द्र, देव, गंधर्व, शिव इस धरती पर उतर आए हैं।
जब भी किसी शहर में उनके प्रदर्शन के पोस्टर लगते थे तो पूरे शहर में जैसे एक हंगामा सा हो जाता था कि उदयशंकर आ रहे हैं चाहे वह दिल्ली हो, लखनऊ हो, मुम्बई हो, कोलकाता हो या चैन्नई हो। यहाँ तक कि लंदन, पेरिस और न्यूयार्क में भी एक हलचल सी मच जाती थी। लोग उनके और उनकी मंडली के प्रदर्शन देखने को उत्सुक रहते थे। उनके शो हर जगह हाउसफुल जाते थे।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य परम्पराओं से ज्यादा किसी औपचारिक प्रशिक्षण और शिक्षा-दीक्षा के बगैर भी उदयशंकर ने जैसे इन शास्त्रीय नृत्य परम्पराओं का पुनराविष्कार किया और शताब्दियों से दबी-ढकी नृत्य पद्धतियों की पुनः पहचान की। रामायण, महाभारत, जैसे मिथकों से प्रेरणा लेने के साथ साथ उन्होंने जनजातीय नृत्य रूपों की भी पहचान की। डांस, बैले और शैडो प्ले (छाया नाटक) भी उन्होंने रचे। मिथकों से प्रेरणा लेने वाले उदयशंकर आज स्वयं एक मिथक बन चुके हैं। अवतारों पर नृत्य करने वाले आज खुद एक अवतार बन गए हैं।

८ दिसम्बर १९०७ को उदयशंकर का जन्म राजस्थान के उदयपुर में हुआ था इसलिए उनका नाम उदयशंकर रखा गया। जैसोर (बंगलादेश) के मूल निवासी उदयशंकर के पिता पण्डित श्याम शंकर राजस्थान चले आए थे। जहाँ वे झालावाड महाराज के निजी सचिव थे। झालावाड के महाराजा कलाप्रेमी और कला संरक्षक थे। शुरू में उदय का मन किताबों में नहीं लगा। माता-पिता को उनकी चिन्ता रहती थी। तब उन्हें पता नहीं था कि उदय में जन्मजात कलाकार छुपा बैठा है। वे अपनी माँ हेमांगिनी के साथ जहाँ भी जाते वहाँ नृत्य समारोहों में जरूर जाते और उनका अध्ययन करते। बनारस में गाजीपुर के पास नसरतपुर गाँव में, राजस्थान, बंगाल और अन्य जगहों पर भी वे अहीरों, चमारों, भीलों और मारवाडयों के नृत्य देखते। शुरू में चित्रकला के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उनके पिता ने १९१८ में उन्हें जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में भेजा, जहाँ उन्होंने असाधारण रुचि दिखाते हुए दो वर्ष में ही पाठ्यक्रम पूरा कर लिया। संगीत में गहरी रुचि होने के कारण मुम्बई में वे गंधर्व महाविद्यालय भी जाते थे।

१९२० में उदयशंकर रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट्स, लंदन में पढने गए। रॉयल कॉलेज के प्रेसीडेंट सर विलियम रोथेंसटीन कलाप्रेमी विद्वान् थे। उन्होंने उदयशंकर को ब्रिटिश म्यूजियम के क्यूरेटर के पास भेजा। ब्रिटिश म्यूजियम में उदय ने कला पर सैकडों किताबें पढीं और उनकी आँखें खुल गई। उन्हें पहली बार पता लगा कि हमारे देश में भी कला की अकूत सम्पदा है। हमारे देश में भी कला, संगीत, संस्कृति और नृत्य की महत्त्वपूर्ण विरासत छिपी है, जिसे खोजने, पहचानने की जरूरत है। कला के अंतिम वर्ष में प्रथम श्रेणी पाने वाले पहले भारतीय बने और उन्हें रोम में अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति मिली।

उदयशंकर के कॉलेज में किए गए एक नृत्य से लेडी डौरावती टाटा भी बहुत प्रभावित हुईं और उन्होंने उन्हें भारत दिवस पर लंदन के वैम्बले थियेटर में प्रदर्शन करने को कहा। सम्राट् जार्ज पंचम ने उनके शिव नृत्य को देखा और बधाई दी। शंकर के पिता जी विद्वान् होने के साथ साथ राजनीतिज्ञ भी थे। वे लंदन में १९१४ से १९२४ तक रहे। तभी रूसी नर्तकी अन्ना पावलोवा उदय के सम्फ में आई और उन्होंने उदयशंकर की मूल मुद्राओं पर आधारित प्रख्यात चित्र �अजंता� बनाया जिसमें उदयशंकर खुद अजंता की एक मूर्ति बने हुए हैं। उन्होंने ही उदयशंकर को राधा कृष्ण और हिन्दू विवाह नृत्य संरचनाएँ करने को उकसाया। इसमें उदयशंकर कृष्ण बने और पावलोवा राधा बनी। रॉयल आपेरा हाउस में यह नृत्य खूब हिट हुआ। पावलोवा उन्हें अपने नृत्य दल में शामिल करके अमरीका ले गईं।

१९२९ में उदयशंकर जब भारत लौटे तो एक चित्रकार की हैसियत से नहीं, बल्कि एक नर्तक की हैसियत से, हालाँकि चित्रकला में उनके पास रॉयल कॉलेज की डिग्री थी। विलियम रोथेंस्टीन के शिष्य को नर्तकी पावलोवा ने हडप लिया था। लेकिन पावलोवा सही थी। किसी चित्रकार और मूर्तिकार के पास ऐसी दिव्य देह नहीं थी, जैसी उदयशंकर के पास थी। वे जन्मजात नर्तक थे। भव्य दिव्य देह के स्वामी रवीन्द्रनाथ ने भारतीय कविता को अवनीन्द्रनाथ ने भारत की चित्रकला को विश्व के सामने प्रस्तुत करने में जो काम किया वही काम उदयशंकर ने भारतीय नृत्य के लिये किया। ऐसे समय उदयशंकर ने भारतीय नृत्य को नई शास्त्रीय ऊँचाइयाँ प्रदान की जब नृत्य को नाचने गाने वालियों, बाइयों, देवदासियों और मिरासियों का काम माना जाता था। उदयशंकर के तीन भाई देवेन्द्र, राजेन्द्र, और रविशंकर। पं. रविशंकर प्रसिद्ध संगीतकार हैं। उन्होंने अपने दादा यानी बडे भाई की कला के बारे में खूब लिखा है।

१९३५ में उदय की मुलाकात �अमला नंदी� से हुई जो पेरिस गई हुई थीं। वे भी उनकी मण्डली में शामिल हुई और १९४२ में उन्होंने विवाह कर लिया। अमलाशंकर ने अभी कुछ वर्ष पहले ८२ वर्ष की उम्र में उदयशंकर जन्म शताब्दी समारोह में दिल्ली के कमानी सभागार में नृत्य प्रस्तुत किया था। ममताशंकर प्रख्यात अभिनेत्री इनकी बेटी हैं। १९३७ में उदयशंकर जब कलकत्ता लौटे तो रवीन्द्रनाथ ने उनका भरपूर स्वागत अभिनंदन किया। तब वे अपनी नृत्य मुद्राओं से विश्वविजय कर चुके थे। अल्मोडा में जब संस्कृति केन्द्र खोलने की बात आई तो पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने भरपूर समर्थन दिया। १९३७ में हिमालय की गोद में अल्मोडा में नृत्य प्रशिक्षण केन्द्र खोला गया।

बर्फीले हिमशिखरों की छाया में अल्मोडा में पहली मार्च १९४० को जो उदयशंकर भारत संस्कृति केन्द्र खोला गया। उसमें सचमुच भारत की संस्कृति का समूचा प्रतिनिधित्व था। तंजौर, केरल, असम, गुजरात, उडीसा, संयुक्त प्रान्त, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, काठियावाड के विभिन्न नृत्य समूहों के गुरु शिष्य यहाँ कला साधना के लिए एकत्र हुए। शिष्यों को नृत्य नाट्य की ही नहीं नृत्य संरचना (कोरियोग्राफी) की भी ट्रेनिंग दी गई। वस्त्र संरचना, पोशाक, मुखौटे, मेकअप और मंच सज्जा की भी दीक्षा दी गई। उदयशंकर को २८० तरह से तबले बजाने आते थे। अल्मोडा का सारा खर्च उदय के विदेशी प्रशंसक उठाते थे। लंदन के उनके प्रशंसक उनकी विशेष मदद करते थे। रविशंकर ने भी इनकी मण्डली के लिए नृत्य किया था। कोष इकट्ठा करने के लिए इस मण्डली ने भारत दौरा किया था। कार्तिकेय, इन्द्र, चित्रसेना, शिव-ताण्डव, शिव-पार्वती, उषा और चित्रलेखा, देवयानी और शर्मिष्ठा जैसे मिथकीय चरित्र के साथ-साथ आधुनिक मनुष्य की विडम्बनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए श्रम और मशीन, जीवन चक्र आदि का भी मंचन किया। साथ ही कुमाऊँ, मारवाडी, भील और किसान नृत्य करके जनजातीय रूपों को अभिव्यक्ति प्रदान की। भारतीय कलारूपों को उन्होंने अपनी समस्त अस्मिता और राष्ट्रीयता के साथ अभिव्यक्त किया, साथ ही उन्हें एक वैश्विक ऊँचाई दी। अल्मोडा केन्द्र से ही गुरुदत्त, शांतिवर्धना, सिम्मी, अमला, सचिन शंकर (बेटा), मोहन सेहगल, सुन्दरी, श्रीधराणी, प्रभात गांगुली, जौहरा सहगल, पं. नरेन्द्र शर्मा, देवीलाल सामर, भगवान आदि कई प्रख्यात शिष्य दीक्षित होकर निकले, लेकिन वित्तीय मजबूरियों के चलते अल्मोडा संस्कृति केन्द्र बंद कर देना पडा। खर्च का बोझ ज्यादा हो गया था अन्य व्यावहारिक समस्याएँ आ खडी हुई थीं।

उदयशंकर ने अपनी सृजनात्मकता को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए �कल्पना� फिल्म का निर्माण किया, जिसके गीत महाकवि पं. सुमित्रानन्दन पंत ने लिखे थे। उदयशंकर ने उसका निर्देशन, निर्माण तो किया ही पटकथा भी लिखी। इसमें उनके व्यक्तित्व की समग्रता और प्रतिभा का समुच्चय है। इस महान् प्रतिभा का केवल आज यही दस्तावेज हमारे पास बचा है। चूँकि इसमें उनके महान् कला व्यक्तित्व के कुछ टुकडे ही जगह जगह जोडे गए थे, अतः व्यावसायिक रूप से यह फिल्म बुरी तरह पिट गई। �कल्पना� में उदय और अमला की जोडी थी।

मद्रास के सांस्कृतिक वातावरण से प्रभावित होकर उदयशंकर ने वहाँ भी एक घर बनाया, जिसमें एक सभागार भी था। वहाँ भी एक नृत्यमण्डली बनाई और चीन, यूरोप तथा अमरीका का भ्रमण किया।

१९६० में वे कलकत्ता चले गए। वहाँ उन्होंने एक अन्य मण्डली बनाई। लेकिन वहाँ उम्र असर करने लगी थी। स्वास्थ्य गिरता जा रहा था। असम में नृत्य प्रदर्शन के दौरान ही उन्हें हृदयाघात पडा। ठीक होते ही वे अमरीका दौरे पर चले गए, जहाँ १९६८-६९ में उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा। सेनडिएगो अस्पताल में ठीक होने के बाद वे भाई रविशंकर के साथ लासएंजेल्स में रहे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उनकी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता मंद नहीं पडी थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर जन्मशताब्दी के लिए १९६९ में उन्होंने �सामान्य क्षति� नाम का भव्य प्रदर्शन किया था।

बुद्ध की २५०० वीं जयन्ती पर बुद्ध के जीवन पर छायानाटक तैयार किया। ७१ बरस की पकी उम्र में भी शैक्सपीयर की नई प्रस्तुति तैयार की। उनकी कला टैगोर के शब्दों में कहें तो केवल प्रान्तीयता की चौहद्वी में सिमटकर नहीं रही।

उदयशंकर को देश-विदेश से अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। संगीत नाटक अकादमी की रत्न सदस्यता, विश्वभारती, विश्वविद्यालय शान्तिनिकेतन से देशिकोत्तम और १९९७ में पद्म विभूषण मिला। रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के वे पहले नाटक नृत्य डीन बने। इसी विश्वविद्यालय ने उनकी स्मृति में एक सभागार का नाम उनके नाम पर रखा और वहाँ उदयशंकर पीठ की स्थापना की। लेकिन आखिरी दिन उनके दुःखभरे बीते। नेहरू फैलोशिप के लिए उनके आवेदन को ठुकरा दिया गया। कलकत्ता के एक अंधेरे कोने में केवल अपने रसोइए और एक दो नौकर के साथ वे गुमनामी में जी रहे थे। बीमारी में उन्हें अकेलेपन का संताप डस रहा था। उन्हें उनके अपने परिवार ने अकेले छोड दिया था और उन लोगों ने भी जो उनके अच्छे दिनों में तो उनके साथ थे। भाई रविशंकर ने विदेशों में उनके रहने की पक्की व्यवस्था की थी पर उदय वहाँ गए नहीं। लाखों करोडों में खेलने वाला महान् कलाकार अब भूखों मर रहा था। पहाडों की ऊँचाईयों पर खिला, सोने सा दमकता सूरज अब कलकत्ता के फ्लैट में धीरे धीरे अस्त हो रहा था। राजा रानी की सोने की पोशाकें अब धूल खा रही थीं।

२६ सितम्बर १९७७ की सुबह छह बजकर १० मिनट पर आखिर मृत्यु जब आई तो उन्होंने उसे गले लगा लिया, क्योंकि वही अब उन्हें कष्ट से, अकेलेपन की यातना से मुक्ति दिला सकती थी। उन्होंने अपने बेटे, बेटी और पत्नी को आशीर्वाद दिया और चले गए अंजाने पथ की ओर। नृत्य परम्परा को आगे बढने के लिए चले गए। पश्चिम बंगाल सरकार ने राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की। बंगाल के सरकारी दफ्तर बंद कर दिए गए। मृत्यु ने उन्हें गुमनामी के अंधेरे से निकाला, फिर प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचा दिया था। रवीन्द्र भवन में उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने हजारों लोग पहुँचे। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों की भीड लग गई। डाक विभाग ने उदयशंकर और उनकी नृत्यमण्डली पर टिकट निकाले। उनका ताण्डव नृत्य का टिकट बहुत प्रसिद्ध हुआ। सत्यजीत राय ने उदयशंकर पर वृत्तचित्र बनाने की कोशिशें की, लेकिन वह काम नहीं हो पाया।

अमला शंकर और ममता शंकर कोलकाता में उदयशंकर नृत्य विद्यालय चलाते हैं। वे उदयशंकर की नृत्य परम्परा को आगे बढा रहे हैं। नटराज अब नहीं हैं, लेकिन उनके घुंघरुओं की आवाज अब भी सुनी जा सकती है। संगीत नाटक अकादमी ने उनकी जन्म शताब्दी पर २००१ में दिल्ली में एक सप्ताह की नृत्य नाटक सभाएँ आयोजित की थीं जिसमें इस जीनियस के काम की फिर पहचान की गई थी।

निरर्थकता के बीच कविता

इसी वर्ष ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शीर्ष कवि कुंवर नारायण अपने खंडकाव्य 'वाजश्रवा के बहाने' में कहते हैं कि 'जीवन में संघर्ष ही संघर्ष नहीं हैं। इस तरह चित्रित करने से कि जीवन सतत संघर्षमय ही है उसकी जरुरत से ज्यादा क्रूर छवि उभरती है। उसमें मार्मिक समझौते और सुंदर सुलहें भी हैं। इस विवेक को प्रमुख रखकर भी जीवन को सोचा और चित्रित किया जा सकता है।' हमारे युवा कवियों को और अधेड़ और बुजुर्ग कवियों को भी कुंवर जी से प्रेरणा लेनी चाहिए जो जीवन में और कविता में भी संघर्ष ही संघर्ष देखते हैं। आज से आधी सदी पहले प्रकाशित उनके खंडकाव्य 'आत्मजयी' में नचिकेता की भूमिका प्रमुख थी तो 'वाजश्रवा के बहाने' में उसके पिता के विचारों, भावनाओं और द्वंद्व का चित्रण है। दोनों खंडकाव्य अपने आप में संघर्षशील होते हुए भी कहीं एक दूसरे के पूरक भी हैं। वाजश्रवा और नचिकेता के पात्र भले ही 'कठोपनिषद' से लिए गये हों, किंतु पिता-पुत्र के दृष्टिकोण का अंतर आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उचित ही है कि कुंवर जी ने अपनी यह पुस्तक अपने नचिकेता यानी अपने पुत्र अपूर्व को समर्पित की है। कुंवर जी से भाषा संयम भी सीखा जा सकता है। आज के कवियों को सीखना चाहिए।

पिता की भौतिकता और पुत्र की आत्मिकता के बीच जो टकराव है, आशा-निराशा के बीच का जो द्वंद्व है उसे कवि ने द्वंद्व के रुप में नहीं, बल्कि संयुक्त या दोहरी जीवनी शक्ति के रुप में देखा है। कहीं-कहीं नरेश मेहता की तरह कुंवर जी प्रकृति का आह्वान करते प्रतीत होते हैं। ''कभी एक यज्ञ करता हूँ, उसके साथ बैठकर/ तब पुरोहित हो जाता है पूरा वन/तब आकाश गूँज उठता है, उसके मंत्रोच्चार की/और हवा में फैल जाती है, फूलों की सुगंध।''

कुछ कविताएँ वैदिक ऋचाओं के अनुवाद जैसी लगती हैं। ''लौट आओ प्राण:, पुन: हम प्राणियों के बीच/तुम जहाँ कहीं भी चले गए हो/हमसे बहुत दूर/लोक में परलोक में/तम में/आलोक में, शोक में, अशोक में/वात में, निर्वात में, निर्झर में, निपात में/कात्पि में समाप्ति में।'' पुराकथाओं और मिथकों से संदर्भ लेकर आज के जीवन को देखने की अद्भुत दृष्टि कुंवरजी के पास है।

ऐसे समय में जब अधिकांश अधेड़ और युवा कवि वर्तमान भारतीय सामाजिक, राजनीतिक जीवन को ही अपना प्रमुख विषय बनाए हुए हैं, विष्णु खरे पाठांतर करते हैं और बताते हैं कि हमारे मिथकों से अभी भी प्रेरणा ली जा सकती है। महाभारत की अनेक कथाओं से लेकर उन्होंने अद्भुत कविताएँ रची हैं। इस दृष्टि से प्रतिरोध कविता देखी जा सकती है जो गणेश के जन्म के प्रसंग से उस विचित्र भाग्य हाथी शिशु की नियति भी मार्मिक ढंग से उजागर करती है। जीवन जगत के, सृष्टि के, ईश्वर के अनेक रहस्यों को खोलती हुई उनकी कविता कहीं-कहीं बोझिल तत्सम शब्दावली का शिकार जरुर हो जाती है, लेकिन वे नयी दृष्टि से अंधकार पर-प्रकाश डालते हैं-''यह ठीक है कि जो प्रकाश को जानते हैं/उनके लिए यह अनिवार्य है/लेकिन इस मानसिकता के चलते/अंधकार की अक्षम्य उपेक्षा हुई है।'' एक कविता में तो वे अंग्रेजी के शब्दों की भरमार कर देते हैं और एक कविता गोधरा-मालवा इलाके की है, इसलिए मालवी में लिखी गई है। विष्णु खरे शब्दों की मितव्ययिता को कविता का गुण नहीं मानते और अक्सर गद्य के इलाके में चले जाते हैं। कई बार वे कविता के सीमांतों का अतिक्रमण करने लगते हैं। रुढि़बद्ध काव्य प्रतिमानों को तोड़ते नजर आते हैं।

लीलाधर जगूड़ी अपनी लंबी और छोटी कविताओं के संपुंजन को महाकाव्यात्मक स्वरुप प्रदान करने में सिद्धहस्त हैं। उनकी देखादेखी कई युवा कवि भी इधर लंबी-लंबी छोड़ रहे हैं, लेकिन अक्सर वे एक लंबा और दीर्घ उलजुलूल वाक्य ही लिखकर रह जाते हैं। कविता के उजाड़ में ही कुछ जोड़ते रहते हैं। कवि कहता है कि 'खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है।' लीलाधर जगूड़ी की कविता का मुँह भी आज बाजार से ढंका है, विज्ञापन से ढंका है, अखबार से, अर्थ से ढंका है। आज की कविता में आदिकाल से लेकर आज तक के व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के समस्त संघर्षों और अठखेलियों का एकदम नया काव्य प्रस्तुत करने का भले ही दावा किया जाता है, पर अक्सर यह दावा खोखला साबित होता है। कवि कहता है कि ''अपनी सरस्वती की अंदरुनी खबर और उस पर कड़ी से कड़ी नजर/इस ज्ञान-निर्भर युग में हरेक को रखनी चाहिए।'' पर अक्सर कवि ही यह नहीं कर पाता है। थोथा चना, बाजे घना।

लीलाधर जगूड़ी की चुनी हुई कविताएँ 'कवि ने कहा' में अपेक्षाकृत छोटी कविताएँ हैं। 'रोज हम में से कोई चला जाता है/ रोज हम में से कोई खो जाता है' विष्णु नागर घर, परिवार प्रकृति के चित्रण में सिद्धहस्त हैं। काव्यात्मकता उनके यहां है लेकिन कई बार वे नारा लगाने से नहीं चूकते-''सबसे अच्छी कविता/सबसे बुरे दिनों में पहचानी जाएगी/देखते-देखते आग में बदल जाएगी।'' कविता आग में कब बदलेगी-यह देखना होगा। कविता भारतीय राजनीति को ही नहीं बदल पाई। नरेन्द्र मोदी को ही नहीं बदल पाई, जबकि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लगभग हर बड़े कवि ने विषवमन किया है। क्या गुजरात में हिन्दी कविता नहीं पढ़ी जाती?

आज अधिकांश कविता खराब लिखी जा रही है। समाज और जीवन खराब है, क्या इसीलिए स्वाभाविक है कि कविता भी खराब हो। लीलाधर जगूड़ी-''यह जो कुछ भी कविता बना रही है/इसका सामाजिक खराबियों से ही तो कोई संबंध नहीं?'' समाज के खराब हालातों का तो कविता से संबंध है। ''जो वाक्य देखो वही निरर्थकता के बीच कविता बना चला आता है/अपने गरीब आशय और अर्थ के साथ''-(जगूड़ी)। वहीं असद जैदी कहते हैं-''एक कविता जो पहले ही से खराब थी/होती जा रही है अब और खराब/सारी समालोचना राख है, जिसके सामने। भाव की जगह शब्द ''ऊल-जुलूल और फिजूल में भी/कोई न कोई अर्थ या ध्वनि पैदा कर ही देता है।''(जगूड़ी)

अन्याय को ईश्वर की तरफ सर्वव्यापक देखकर आज का कवि अपनी आँखें मूँद लेना चाहता है। उसका प्रतिकार करने की ताकत जैसे आज के मनुष्य में नहीं है, वैसे ही आज के कवि में भी नहीं है।

आज की कविता विश्व कविता का कोलाज भर है, उसमें संपादन की कमी है।
आज समाज में कविता और कवि की जो जगह है उसमें फिर भी मैं कवि हूँ, कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है।
वरिष्ठ कवि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के संग्रह 'फिर भी कुछ रह जाएगा।' में ठंडी आग है। न उछाल है न उद्दाम आग है, न आत्मरति और न बनावट, न कविता बनाने की जुगत इनमें है। इनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति तथा राग और विराग की बेचैनी है। इस दुखमय जगत के बीच जीने की अदम्य जीजीविषा मरणधर्मा संसार में कुछ अनीश्वर की खोज, अर्थ के भीतर भी अर्थ की तलाश और व्यक्त में ही अव्यक्त की तलाश इनमें देखी जा सकती है। इनमें अनंत जन्मों की कथा है। घर-परिवार, स्त्री शोषण पर चिरपरिचित कविताएँ हैं।
हेमंत शेष के 'बहुत कुछ जैसा कुछ नहीं' में १९८२ से २००२ के बीच की कविताएँ हैं। इनमें अनुभवों और अनुभूतियों का एक समृद्ध संसार प्रकट होता है। घर के बारे में कविता लिखते हुए वे कविता का घर बनाते हैं। 'दरवाजे अच्छी कविता है।'

असद जैदी-'सामान की तलाश' और नीलाभ-'ईश्वर को मोक्ष में' भारतीय राजनीति, हिन्दू सांप्रदायिकता, गुजरात नरसंहार और नरेन्द्र मोदी के पापों पर चोट करते हैं। असद जैदी के एकांगी दृष्टिकोण पर वर्षभर बहस चली है। नीलाभ ने ठीक ही लिखा है कि ''निश्चिय ही कविता के लिए यह बुरा वक्त है। जब वह कवि को, हजारों के पुरस्कार दिला देती है। लाख रुपए की विदेश यात्रा करा देती है, मगर पचास पाठक नहीं जुटा पाती। निश्चिय ही कविता के लिए यह बहुत बुरा वक्त है।'' नीलाभ ने ही लिखा है कि ''कविता इन दिनों कुछ इतनी बेढंगी हो गयी है कि समझ में नहीं आता कि उसका क्या करें।''

स्त्रियाँ और स्त्रीजीवन आज की हिन्दी कविता में पूरी संवेदनशीलता के साथ आया है। आज जितनी कवियित्रियाँ हिन्दी में दिखाई देती हैं। उतनी पहले कभी नहीं रहीं। स्त्री की जीवंत एवं मार्मिक उपस्थिति पुरुष कवियों में भी बराबर देखी जा सकती हैं। कवि तुमुल कोलाहल कलह के बीच निरंतर अपने को मांज रहे हैं। वे यह जान गए है कि आत्ममुग्धता के शिकार कवि ज्यादा दिन तक नहीं चल पाएँगे उनकी पूँजी चुक जाती है। 'बयां' जैसी अद्र्धवार्षिक पत्रिका में भी अच्छी कविताएँ आई हैं।

कई कवि अपने वरिष्ठ कवियों की अंधाधुंध नकल करके ही अपनी दुकान चला रहे हैं। कुछ पत्रिकाएँ और प्रकाशक ऐसे कवियों को कुछ समय तक बढ़ावा जरुर देते हैं, लेकिन यह सब देर तक नहीं चलता है और उनकी दुकानदारी बंद हो जाती है। कविता के कंटकाकीर्ण मार्ग पर अपनी ही खुद की रसद लेकर चलना होता है। कमलेश जैसे कवि का इस वर्ष फिर सक्रिय होना इस बात का उदाहरण है कि अपने समय की कविता की चमक-धमक से निर्लिप्त रहकर भी सार्थक कविता लिखी जा सकती हैं। कमलेश फैशनेबल कविता नहीं लिखते। उधार के आयातित अनुभव उनकी कविता में जगह नहीं पाते।

प्रयाग शुक्ल जैसे कवि 'हाइकु' को लेकर भी अनेक प्रयोग कर रहे हैं।

आज की हिन्दी कविता स्त्रियों, दलितों, वंचितों की होकर भी किसी राजनीतिक संगठन से जुड़ी हुई नहीं है। उसमें दलित एजेंडा उस तरह उभरकर नहीं आता है, जिस तरह दलित कहानीकारों में वह आता है। दुनिया को और सुंदर और मानवीय और अर्थगर्भ बनाने में आज का कवि और उसकी कविता लगी है। जीवन और समाज के अंधेरे कोनों-अंतरों में झाँक कर वे जीवन में उजाला लाते हैं। जहाँ बहुत अधिक उजाला होता है, वहाँ का अंधेरा दिखाने के लिए सही कवि की जरुरत पड़ती है। नए-नए संदर्भों पर इतनी अच्छी कविताएँ इधर पढऩे को मिली हैं कि समकालीन कविता के वस्तुजगत में जबर्दस्त फैलाव आया है। समकालीन हिन्दी कविता का सौंदर्यबोध और बढ़ेगा। अगर कुछ कवि स्मार्ट वक्तव्यों की कीर्तियागिरी से बचें और कविता में ज्यादा चतुरसुजान न बनें। सामाजिक परिवेश में हिंसा के दुष्प्रभावों को लोकजीवन की आंतरिक तहों में देखने का काम महत्वपूर्ण ढंग से ऋतुराज और श्रीप्रकाश शुक्ल ने इधर किया है। इनकी कविताओं में हिंसा के नए-नए रुप दिखाए जा रहे हैं। इनकी कविताओं में हिन्दी प्रदेशों की सांस्कृतिक चेतना पर पडऩे वाले तरह-तरह के संकट देखे जा सकते हैं। प्रसार माध्यमों द्वारा फैलाई जा रही छद्दम चेतना और इन सबके बीच कवि और उसके परिवेश के निरंतर जटिल होते संबंधों की अनुगंूज सुनी जा सकती है। ये कवि एक नई अंतदृष्टि के साथ राजनीति, अर्थ, समाज विज्ञान, मनोविज्ञान और संस्कृति के आपसी जटिल संबंधों की पड़ताल कर रहे हैं।

यह सही है कि क्लीशे और काव्यरुढिय़ों पर हमला बोलने वाली कविता आज कम लिखी जा रही है पर वह निरंतर मत-मतांतरों और मताग्रहों को तोड़ती चल रही है। गलाकाट प्रतिद्वंद्विता से भरे समय में मनुष्य के सामने आज अपनी अस्तित्व रक्षा का ही संकट आ खड़ा हुआ है। किसानों की आत्महत्या के दिल दहलाने वाले आँकड़े आज हमारे सामने हैं। घर, परिवार, बेरोजगारी, असामनता, प्रेम और स्नेह की अनुपस्थिति, असुरक्षा, अनियमितता, आशंकाएँ, घरेलू और सामाजिक हिंसा के नए-नए रुप आज हमारे कवि को विचलित कर रहे हैं। वो इन सबके बीच अपना निजी मुहावरा तलाश कर रहे है।

सम्पर्क- २१ ब, लॉ एपॉर्टमेंट, ए.जी.सी.आर. इंकलेव, दिल्ली-११००९२, मो.-०९३१२१४७०५१
(Source: http://www.prernamagazine.com/dec-09/bahas-kai-liye/rajendra.html )